ब्रिटेन में CJI गवई का बड़ा बयान, बोले- 1993 से पहले सरकार करती थी जजों की नियुक्ति
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने ब्रिटेन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन में बोलते हुए भारत में न्यायिक नियुक्तियों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 1993 से पहले तक जजों की नियुक्ति में अंतिम फैसला सरकार का होता था, और उस दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा।
गवई ने कहा कि आज जिस कॉलेजियम सिस्टम को लेकर बहस हो रही है, वह न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाए रखने के लिए जरूरी है। उन्होंने बताया कि अतीत में दो बार ऐसा हुआ जब सरकार ने मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय वरिष्ठता की परंपरा तोड़ी।
नेहरू सरकार पर उठाया सवाल, कहा- सीनियर जजों को नजरअंदाज किया गया
CJI गवई ने वर्ष 1964 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर जस्टिस पी.बी. गजेंद्रगडकर को भारत का सातवां मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था।
इस नियुक्ति के समय जस्टिस सैयद जफर इमाम और जस्टिस हंसराज खन्ना उनसे वरिष्ठ थे, लेकिन उन्हें स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर पद से दूर रखा गया। CJI गवई के अनुसार, यह नियुक्ति न्यायिक सीनियरिटी के सिद्धांत के खिलाफ थी और इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हुए।

कौन थे जस्टिस पी.बी. गजेंद्रगडकर, जिनकी नियुक्ति पर हुआ विवाद?
जस्टिस पी.बी. गजेंद्रगडकर का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में एक संस्कृत विद्वान परिवार में हुआ था। उन्होंने पुणे के डेक्कन कॉलेज से उच्च शिक्षा ली और फिर कानून की पढ़ाई पूरी कर बंबई हाईकोर्ट में वकालत शुरू की।
वर्ष 1945 में वह हाईकोर्ट के जज बने और 1956 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। 1964 से 1966 तक वह भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे। इस दौरान उन्होंने कई अहम आयोगों का नेतृत्व किया जैसे- विधि आयोग, श्रम आयोग, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया और जम्मू-कश्मीर जांच आयोग।
हालांकि उनकी नियुक्ति को लेकर हमेशा ये कहा गया कि इसमें सरकार की ‘विशेष कृपा’ थी।
शांति भूषण से जुड़ा दिलचस्प किस्सा, आत्मकथा में किया गया खुलासा
जस्टिस गजेंद्रगडकर पर एक और विवाद से जुड़ा आरोप यह भी है कि उन्होंने न्यायमूर्ति शांति भूषण को उनकी कम उम्र (40 साल) का हवाला देकर CJI बनने से रोका।
बाद में जब जनता पार्टी की सरकार आई और शांति भूषण कानून मंत्री बने, तो गजेंद्रगडकर को डर हुआ कि कहीं उन्हें विधि आयोग के अध्यक्ष पद से हटा न दिया जाए।
शांति भूषण ने अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र किया है। उन्होंने लिखा, “गजेंद्रगडकर कई बार मुझसे मिलने आए और चेयरमैन पद से न हटाने के लिए निवेदन करते रहे।”
यह घटना दिखाती है कि न्यायपालिका में सरकारी दखल कितना गहरा असर डाल सकता है।
