Tibetan Action Institute (TAI) की हालिया रिपोर्ट में एक बार फिर China की cultural infiltration को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
China की cultural infiltrationका नया चेहरा: तिब्बती बच्चों पर विचारधारा थोपने का प्रयास
Tibetan Action Institute (TAI) की हालिया रिपोर्ट में एक बार फिर China की cultural infiltration को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, China ने अब तक लगभग 10 लाख बच्चों को जबरन सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में दाखिल करवा दिया है। इसमें 4 से 6 साल के लगभग 1 लाख छोटे बच्चे भी शामिल हैं। इन स्कूलों में बच्चों को उनके तिब्बती धर्म, भाषा और संस्कृति से काटकर चीनी विचारधारा में ढालने का सिलसिला जारी है। यह केवल शिक्षा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हमला है Tibet की सांस्कृतिक पहचान पर।

बच्चों को माता-पिता से किया जा रहा जबरन अलग, भावना व परंपरा दोनों पर हमला
रिपोर्ट में कहा गया है कि China के निर्देश पर Tibet के दूरस्थ गांवों से छोटे बच्चों को जबरन अलग करके आवासीय स्कूलों में भेजा जा रहा है। इन स्कूलों में न तो सही देखभाल है और न ही पारिवारिक या सांस्कृतिक जुड़ाव। डॉ. ग्याल लो, जो कि एक जाने-माने तिब्बती समाजशास्त्री हैं, कहते हैं कि यह बच्चों का “सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण” है। उन्होंने स्वयं Tibet में 50 से अधिक स्कूलों का दौरा किया और पाया कि वहां भावनात्मक उपेक्षा और संस्कृति के प्रति घोर अनादर किया जा रहा है। 2020 में Tibet छोड़ने वाले डॉ. ग्याल लो अब TAI के साथ मिलकर इस संकट को उजागर कर रहे हैं।
तिब्बती भाषा पर पाबंदी, चीनी में पढ़ाई और इतिहास में हेरफेर
TAI की रिपोर्ट के अनुसार, इन बोर्डिंग स्कूलों में तिब्बती भाषा बोलने पर रोक है। बच्चों को केवल चीनी भाषा में पढ़ाई कराई जाती है, जिससे उनकी जड़ों से दूरी बनती जा रही है। उन्हें इतिहास भी वही पढ़ाया जा रहा है जो China की कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से मेल खाता है। यह सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि पूरे मनोविज्ञान को बदलने का प्रयास है। बच्चों को यह सिखाया जा रहा है कि चीनी पहचान ही उनकी असली पहचान है, और Tibet की सांस्कृतिक विरासत को पिछड़ा व अप्रासंगिक बताया जाता है।
China की धार्मिक रणनीति: दलाई लामा की संस्था को भी अपने नियंत्रण में लाने की साजिश
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि China न केवल सांस्कृतिक स्तर पर तिब्बती पहचान को मिटा रहा है, बल्कि वह Tibet के धार्मिक नेतृत्व पर भी कब्जा जमाने की कोशिश में है। दलाई लामा की संस्था पर नियंत्रण पाने के लिए China ने उनके उत्तराधिकारी के चयन में दखल देने की योजना बनाई है। यह एक खतरनाक संकेत है कि आने वाले समय में धार्मिक स्वतंत्रता भी पूरी तरह से खतरे में पड़ सकती है। China की यह नीति दर्शाती है कि वह केवल तिब्बती संस्कृति को ही नहीं, बल्कि पूरे अस्तित्व को अपनी राजनीतिक सोच के अधीन लाना चाहता है।
