पुरी के मशहूर मंदिर में भगवान Jagannath Rath Yatra की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां पत्थर की नहीं, बल्कि नीम की लकड़ी से बनी होती हैं।
हर 12 साल में बदलती हैं भगवान की मूर्तियां, होती है नवकलेवर की परंपरा
पुरी के मशहूर मंदिर में भगवान Jagannath Rath Yatra की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां पत्थर की नहीं, बल्कि नीम की लकड़ी से बनी होती हैं। हर 12 साल में इन मूर्तियों को बदला जाता है जिसे नवकलेवर कहा जाता है। यह परंपरा जीवन में नयापन और बदलाव का प्रतीक मानी जाती है।
बारिश और रथ यात्रा का अद्भुत संबंध, हर साल होती है वर्षा
ऐसी मान्यता है कि Jagannath Rath Yatra के दिन बारिश जरूर होती है। कहा जाता है कि अब तक ऐसा कोई वर्ष नहीं आया जिसमें रथ यात्रा के दिन बारिश न हुई हो। लोग मानते हैं कि प्रकृति भी इस शुभ अवसर में भाग लेती है, जो इसे और भी विशेष बना देती है।

की झाड़ू से होती है सफाई, रथ बनाने में नहीं लगती कील
यात्रा से पहले जिस रास्ते से रथ गुजरता है, वहां राजघराने के वंशज सोने के हत्थों वाली झाड़ू से सफाई करते हैं। इसे शुभता और भगवान के प्रति आदर का प्रतीक माना जाता है। रथ दारुक नाम की लकड़ी से बनाए जाते हैं और इनमें कोई कील या धातु नहीं लगाई जाती। बलराम का रथ ‘तालध्वज’ (14 पहिए), सुभद्रा का ‘दर्पदलन’ (12 पहिए), और जगन्नाथ जी का ‘नंदीघोष’ (16 पहिए) होता है।
रथ खींचने की परंपरा, वस्त्र निर्माण और नीलामी की खासियतें
Jagannath Rath Yatra में कोई भी भक्त भगवान का रथ खींच सकता है — इसमें न जाति देखी जाती है, न धर्म। यह सेवा और समानता का प्रतीक है। भगवान के वस्त्र रावतपाड़ा गांव के बुनकर बनाते हैं, जो पीढ़ियों से यह परंपरा निभा रहे हैं। यात्रा के बाद रथ के पुराने हिस्सों की नीलामी होती है। 2024 में इससे 55 लाख रुपये मंदिर को प्राप्त हुए थे। एक रथ का पहिया 1.5 से 3 लाख रुपये तक बिकता है।
