आपातकाल के दौरान फिल्म Kissa Kursi Ka सबसे ज्यादा विवादों में रही। इस फिल्म का निर्देशन अमृत नाहटा ने किया था
Kissa Kursi Ka बनी सेंसरशिप की सबसे बड़ी शिकार
आपातकाल के दौरान फिल्म Kissa Kursi Ka सबसे ज्यादा विवादों में रही। इस फिल्म का निर्देशन अमृत नाहटा ने किया था, जो एक राजनीतिक व्यंग्य था। फिल्म में उस समय की सरकार और खासकर संजय गांधी जैसे किरदारों की छवि पर तंज किया गया था। नतीजा ये हुआ कि सूचना और प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला ने Kissa Kursi Ka की नेगेटिव रील जब्त करवा कर जला दी। इस फिल्म में शबाना आजमी, राज बब्बर और उत्पल दत्त जैसे कलाकार थे।
Amrit Nahata ने बाद में Kissa Kursi Ka को दोबारा 1978 में रिलीज़ किया, लेकिन तब भी सेंसर बोर्ड ने इसमें कई कट लगाए। Kissa Kursi Ka आज भी आपातकाल की सेंसरशिप की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है।
‘आंधी’ पर भी पड़ी पाबंदी, काल्पनिक कहकर भी नहीं मिली राहत
गुलज़ार की चर्चित फिल्म ‘आंधी’ भी Emergency का शिकार बनी। फिल्म में सुचित्रा सेन द्वारा निभाया गया किरदार ‘आरती देवी’ लोगों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जैसा लगा। सरकार ने तुरंत इस फिल्म पर रोक लगा दी, हालांकि निर्माता इसे काल्पनिक कहानी बताते रहे। Emergency खत्म होने के बाद ‘आंधी’ को दोबारा रिलीज़ किया गया।
‘आंधी’ के साथ-साथ Kissa Kursi Ka को भी बार-बार सेंसर के नाम पर निशाना बनाया गया, जो दिखाता है कि राजनीतिक संवेदनाओं से टकराने वाली रचनाओं को कैसे दबाया गया।
डॉक्यूमेंट्री और व्यंग्य फिल्में भी नहीं बचीं, ‘नसबंदी’ और ‘क्रांति की तरंगे’ भी बैन
आईएस जौहर की फिल्म ‘नसबंदी’ ने आपातकाल के दौरान हुए जबरन नसबंदी अभियान पर व्यंग्य किया था। फिल्म में बॉलीवुड सितारों के डुप्लीकेट्स का प्रयोग कर दर्शकों तक कटाक्ष पहुंचाने की कोशिश की गई। सरकार ने इसे तुरंत बैन कर दिया। वहीं आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री ‘क्रांति की तरंगे’ ने जेपी आंदोलन की सच्चाई को दिखाया, लेकिन उसे भी भूमिगत तरीके से ही लोगों तक पहुंचाया गया।
इन फिल्मों के साथ Kissa Kursi Ka को भी एक ही श्रेणी में देखा जाता है, जिसने सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश की थी।
‘चंदा मारुथा’ और ‘आंदोलन’ जैसी फिल्मों ने चुकाई अभिव्यक्ति की भारी कीमत
कन्नड़ फिल्म ‘चंदा मारुथा’ में काम करने वाली स्नेहलता रेड्डी को जेल में डाल दिया गया और पैरोल पर आने के कुछ दिन बाद ही उनकी मौत हो गई। वहीं, ‘आंदोलन’ जैसी फिल्म जो ब्रिटिश राज पर आधारित थी, उसे भी सेंसर की कैंची से नहीं बख्शा गया।
इन घटनाओं ने साफ किया कि Kissa Kursi Ka जैसी फिल्मों को चुप कराने की कोशिश एक ट्रेंड था, जिससे रचनात्मक आज़ादी को गहरी चोट पहुंची।
