देश की पुस्तक उद्योग में CCI (Competition Commission of India) की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है।
CCI की जांच में उजागर हुआ किताबों की कीमत तय करने वाला कार्टेल
देश की पुस्तक उद्योग में CCI (Competition Commission of India) की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। इस जांच में यह सामने आया कि भारत की प्रतिष्ठित संस्था Federation of Publishers and Booksellers Associations in India (FPBAI) एक संगठित तरीके से किताबों और जर्नलों की कीमतें तय कर रही थी। ये गतिविधियां खासतौर पर विदेशी मुद्राओं में आने वाली किताबों की दरों को लेकर थीं। संस्था ने अपने एक सब-ग्रुप “GOC” के माध्यम से रुपये की तुलना में डॉलर और यूरो की दरें जानबूझकर 3-5% ज्यादा निर्धारित कीं, जिससे किताबों की कीमतें बढ़ गईं। इससे न सिर्फ उपभोक्ताओं पर भार पड़ा, बल्कि छोटे व्यापारियों को भी नुकसान झेलना पड़ा।
CCI ने FPBAI और तीन पदाधिकारियों पर लगाया जुर्माना
CCI ने प्रकाशक प्रणव गुप्ता की शिकायत पर यह जांच शुरू की थी। जांच में सामने आया कि FPBAI ने गुप्त रूप से मूल्य निर्धारण और छूट की सीमा तय की थी और जो सदस्य इसकी निर्धारित GOC दरों को नहीं मानते थे, उन्हें सदस्यता से बाहर करने की धमकी दी जाती थी। इस आधार पर CCI ने FPBAI पर ₹2,56,649 और तीन प्रमुख पदाधिकारियों—प्रदीप अरोड़ा, एससी सेठी और प्रशांत जैन—पर अलग-अलग जुर्माना लगाया। प्रदीप अरोड़ा और प्रशांत जैन पर ₹1 लाख, जबकि एससी सेठी पर ₹1,76,305 का दंड लगाया गया है।
CCI की रिपोर्ट में कहा गया – बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म कर रहा था यह गठजोड़
CCI की विस्तृत जांच रिपोर्ट में पाया गया कि FPBAI की यह नीति केवल कुछ चुनिंदा व्यापारियों को लाभ पहुंचा रही थी। GOC द्वारा घोषित विदेशी मुद्रा दरें हमेशा आरबीआई की तुलना में अधिक होती थीं, जिससे किताबों की कीमतें अनावश्यक रूप से बढ़ जाती थीं। इस स्थिति में छोटे व्यापारी, जो विदेशी किताबें खरीदकर स्कूलों, कॉलेजों और लाइब्रेरी को सप्लाई करते थे, को नुकसान उठाना पड़ता था क्योंकि ग्राहक केवल RBI की दरों पर कीमत देने को तैयार होते थे। वहीं, सरकारी पुस्तकालयों में भी केवल FPBAI से जुड़े विक्रेताओं को प्राथमिकता दी जाती थी, जिससे बाजार में भेदभाव का माहौल बनता गया।
फैसला बुक इंडस्ट्री में लाएगा नई पारदर्शिता और समान अवसर
CCI ने स्पष्ट किया कि भले ही FPBAI का दावा हो कि उनकी दरें सिर्फ सुझाव थीं, लेकिन जब एक बड़े संगठन की सलाह ही बाजार को नियंत्रित करने लगे, तो वह गैर-कानूनी हो जाती है। CCI ने इसे “Price Fixing” यानी मूल्य निर्धारण की साजिश करार दिया और कहा कि इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा समाप्त होती है। यह फैसला 90,000 करोड़ रुपये से अधिक की बुक इंडस्ट्री पर सीधा असर डालेगा। अब छोटे व्यापारियों को समान अवसर मिलेगा और बड़े संगठनों द्वारा मनमाने ढंग से रेट तय करने की प्रक्रिया पर रोक लगेगी। CCI ने FPBAI को भविष्य में इस तरह की गतिविधियों से दूर रहने का निर्देश दिया है।
