सुप्रीम कोर्ट ने एमपी पुलिस पर पत्रकारों से मारपीट के आरोपों की याचिका पर सुनवाई की, राज्य सरकार को नोटिस जारी
पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने एमपी सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में अवैध रेत खनन की रिपोर्टिंग करने वाले दो पत्रकारों की याचिका पर सुनवाई शुरू की है। पत्रकार शशिकांत जाटव और अमरकांत सिंह चौहान ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उन्हें हिरासत में रखकर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। अदालत ने इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई की तारीख 9 जून तय की गई है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह याचिका स्वीकार करते हुए पत्रकारों को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा की मांग पर विचार किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें जान का खतरा है और पुलिस उनके पत्रकारिता कार्य को दबाने की कोशिश कर रही है।
यह मामला तब सामने आया जब दिल्ली हाई कोर्ट ने मई 2025 में अमरकांत सिंह चौहान को दो महीने की सुरक्षा देने का आदेश दिया था। चौहान, जो स्वराज एक्सप्रेस के भिंड ब्यूरो प्रमुख हैं, ने कोर्ट को बताया था कि पुलिस की धमकियों और डर के कारण उन्हें मध्य प्रदेश छोड़ना पड़ा। उन्होंने कहा कि चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन पर रिपोर्टिंग के बाद से स्थानीय पुलिस उन्हें परेशान कर रही है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने चौहान को सलाह दी थी कि वे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अपनी सुरक्षा के लिए याचिका दायर करें। इस मामले में वरिष्ठ वकील वरीशा फारसत, तमन्ना पंकज, अनिरुद्ध रमणाथन और प्रिया वत्स ने पत्रकारों की तरफ से पैरवी की।
चौहान की याचिका में यह भी कहा गया है कि मध्य प्रदेश में कई स्वतंत्र पत्रकारों को पुलिस लगातार डराने-धमकाने की कोशिश कर रही है। पत्रकार धर्मेंद्र ओझा (न्यूज़ 24), शशिकांत जाटव (बेजोड़ रत्न) और प्रीतम सिंह (NTV भारत) को भी भिंड एसपी ऑफिस बुलाया गया था, जहाँ उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई, मोबाइल जब्त किए गए और बयान देने के लिए मजबूर किया गया कि “मामला सुलझा लिया गया है।”
पत्रकार शशिकांत जाटव ने कहा, “मुझे भारत के सर्वोच्च न्यायालय पर पूरा भरोसा है। हम केवल अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे और भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे। अब हमें न्याय की उम्मीद है।”
वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार शर्मा ने भी चिंता जताई और कहा, “यह हमला सिर्फ पत्रकारों पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर है। ऐसे मामलों में न्यायपालिका की सक्रियता यह भरोसा दिलाती है कि देश में कानून का राज कायम है।”
यह मामला भारत में पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की आज़ादी को लेकर बढ़ती चिंताओं को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि क्या हमारे लोकतांत्रिक संस्थान पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने में सक्षम हैं।
