Russia द्वारा हाल ही में Taliban government को आधिकारिक मान्यता देने के फैसले ने भारत (India) और अन्य वैश्विक शक्तियों के सामने एक नया कूटनीतिक संकट खड़ा कर दिया है।
Russia ने तालिबान को दी मान्यता, भारत के सामने बड़ा कूटनीतिक प्रश्न
Russia द्वारा हाल ही में Taliban government को आधिकारिक मान्यता देने के फैसले ने भारत (India) और अन्य वैश्विक शक्तियों के सामने एक नया कूटनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। अफगानिस्तान में तालिबान के 2021 में सत्ता में आने के बाद से भारत ने अब तक उसे औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन संवाद के कुछ रास्ते जरूर खुले रखे हैं।
Russia की यह घोषणा न सिर्फ तालिबान के लिए अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है, बल्कि यह कदम उस दिशा में भी इशारा करता है जहां वैश्विक राजनीति अपने सामरिक और आर्थिक हितों को मानवीय मूल्यों से आगे रख रही है। Russia ने तालिबान को मान्यता देने को ऊर्जा, व्यापार, कृषि और परिवहन के क्षेत्र में सहयोग का द्वार बताया है।
चीन ने किया Russia के कदम का समर्थन, भारत की चुप्पी बनी चर्चा का विषय
चीन ने Russia के इस साहसी कदम का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान (Afghanistan) को अंतरराष्ट्रीय मंच से अलग-थलग करना गलत होगा। बीजिंग की इस प्रतिक्रिया से यह साफ हो गया है कि चीन अपने सामरिक हितों को प्राथमिकता देते हुए अफगानिस्तान में प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
वहीं दूसरी ओर, भारत अब भी “Engage without Recognition” की नीति पर कायम है, यानी भारत तालिबान के साथ सीमित संवाद तो कर रहा है लेकिन आधिकारिक मान्यता नहीं दे रहा। इसी वर्ष मई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तालिबान के विदेश मंत्री से फोन पर बातचीत की थी, जिसे पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकारा गया।
भारत की यह रणनीति फिलहाल संतुलन साधने का प्रयास है, लेकिन Russia और चीन के रुख को देखते हुए यह रुख कितने दिन चलेगा, यह बड़ा सवाल बन गया है।
आलोचनाओं के बीच उठ रही मान्यता की संभावनाएं
जहां एक ओर Russia और China जैसे देशों ने Taliban governmentको कूटनीतिक समर्थन देना शुरू कर दिया है, वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता और अफगान नागरिक संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है।
पूर्व अफगान सांसद फौजिया कूफी और Women Political Participation Network जैसे संगठनों का कहना है कि Taliban governmentको मान्यता देने का मतलब है महिलाओं के अधिकारों, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों को नजरअंदाज करना।
भारत के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं:
- पहला, वह अपनी मौजूदा नीति को बनाए रखे, जिसमें बिना मान्यता के संवाद जारी रहे।
- दूसरा, वैश्विक रणनीतिक दबावों और अफगानिस्तान में अपनी जमीनी पकड़ को बनाए रखने के लिए धीरे-धीरे Taliban governmentको मान्यता देने की ओर बढ़े।
यह फैसला भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि, दक्षिण एशिया की स्थिरता और उसके भू-राजनीतिक प्रभाव को सीधा प्रभावित कर सकता है।

अफगानिस्तान में भारत के निवेश और पारंपरिक संबंध भी हैं दांव पर
Afghanistan भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक सामरिक और विकासात्मक साझेदार भी रहा है। भारत ने अब तक अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है और 500 से ज्यादा विकास परियोजनाएं संचालित की हैं, जिनमें सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
JNU की प्रोफेसर अनुराधा चिनाय का मानना है कि भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से सौहार्दपूर्ण रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि Taliban governmentका रुख भारत को लेकर अपेक्षाकृत नरम रहा है, जो एक संवाद का अवसर प्रदान करता है।
हालांकि, तालिबान के कट्टरवादी रवैये, महिला शिक्षा पर रोक और मानवाधिकार हनन को देखते हुए भारत का कोई भी कदम वैश्विक स्तर पर आलोचना का कारण बन सकता है।
