बंगाल से चल रहा घुसपैठ का बड़ा खेल: पहले भाषा सिखाई, फिर पहचान बदलकर बना दिए 'भारतीय'
म्यांमार से शुरू होता है सफर, बंगाल बनता है पहला ठिकाना
म्यांमार से भागे रोहिंग्या शरणार्थियों को पहले बांग्लादेश और फिर भारत लाया जाता है। इस पूरे घुसपैठ के रैकेट का सबसे अहम पड़ाव है पश्चिम बंगाल, जहां मालदा, नदिया और दिनाजपुर जैसे जिलों में इन लोगों को छिपाकर रखा जाता है। यहां इन्हें हिंदी और उर्दू सिखाई जाती है ताकि वे देश के अन्य हिस्सों में आसानी से घुल-मिल सकें।
पहचान बदलने के लिए तैयार की जाती है फर्जी दस्तावेजों की ‘किट’
इन शरणार्थियों को भारतीय नागरिक की पहचान दिलाने के लिए स्थानीय एजेंट और कुछ संगठनों की मदद से फर्जी दस्तावेज बनाए जाते हैं। इनमें आधार कार्ड, वोटर आईडी, बैंक खाता, ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट तक शामिल होते हैं। इस पूरे नेटवर्क का मकसद है इन्हें भारतीय बनाकर देश के अलग-अलग राज्यों में बसा देना।
कानपुर में रोहिंग्या परिवार पकड़ा गया, खुला रैकेट का राज
20 मई को उत्तर प्रदेश के कानपुर में पुलिस ने एक रोहिंग्या युवक साहिल को गिरफ्तार किया, जिससे पूछताछ में चौंकाने वाले खुलासे हुए। साहिल ने बताया कि वह अपने परिवार के 14 सदस्यों के साथ म्यांमार से भागा था और बंगाल होते हुए दिल्ली से होते हुए उन्नाव में बस गया। उसे एक पूर्व सभासद की मदद से न केवल पहचान पत्र बल्कि स्थानीय निवास प्रमाणपत्र भी मिल गया। फिलहाल उसके परिवार की महिलाएं जेल में हैं और जांच जारी है।
पुलिस अलर्ट मोड पर, सवाल उठे प्रशासन और राजनीति पर
उन्नाव के एसपी दीपक भूकर ने बताया कि अब पूरे जिले में सत्यापन अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने आम लोगों से भी सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की सूचना देने की अपील की है।
इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं — क्या इतने सालों तक यह नेटवर्क प्रशासन और राजनीतिक संरक्षण के बिना चल सकता था? क्या ये घुसपैठिए देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं?
